मनोरंजन

श्रद्धा और सौंदर्य का संगम – सिरौली मेला की गाथा

दक्षिणामुखी हनुमान मंदिर से जुड़ी शताब्दी पुरानी कथा, कार्तिक पूर्णिमा पर उमड़ता जनसमूह

एमसीबी

मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले का सिरौली ग्राम हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा के पावन अवसर पर श्रद्धा, संस्कृति और सौंदर्य का अद्भुत संगम बन जाता है। यहां स्थित दक्षिणामुखी संकट मोचन हनुमान मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि एक ऐसा स्थान भी है जहां इतिहास, किवदंती और लोकविश्वास एक सूत्र में गुंथे हैं। तीन दिवसीय सिरौली मेला का आरंभ होते ही पूरे क्षेत्र में भक्ति का वातावरण व्याप्त हो जाता है।

जंगल की गोद से निकली आस्था की ज्योति
इतिहासकार एवं जिला पर्यटन नोडल अधिकारी डॉ. विनोद पांडेय बताते हैं कि सिरौली मंदिर का उद्भव किसी स्थापत्य योजना से नहीं, बल्कि एक अनोखी दैवी प्रेरणा से हुआ। कहा जाता है कि लगभग सन 1924-25 से पूर्व यह इलाका घने जंगलों से घिरा था। स्थानीय गोवाहिकों को एक दिन जंगल के भीतर एक दिव्य प्रतिमा के दर्शन हुए। यह बात तत्कालीन कोरिया नरेश श्री रामानुज प्रताप सिंहदेव तक पहुंची। नरेश स्वयं अपने सेवकों के साथ इस रहस्यमयी स्थल पर आए। उन्होंने वृक्षों की सफाई कर प्रतिमा को खुदवाने का आदेश दिया, किंतु प्रतिमा का दाहिना पैर अनंत गहराई में धंसा हुआ था। रात में नरेश को स्वप्न में आदेश प्राप्त हुआ – “हनुमान जी की प्रतिमा को यहां पूजो, इसे कहीं और न ले जाओ।”

इस दैवी संकेत के बाद विक्रम संवत 2016 (1924-25 ई.) में दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर की स्थापना की गई। मंदिर के प्रथम महंत स्वर्गीय नीलकंठ शुक्ल महाराज रहे। तभी से कार्तिक पूर्णिमा पर मेले की परंपरा प्रारंभ हुई, जो आज तक निरंतर जारी है।

मेले में उमड़ती श्रद्धा और उल्लास की लहर
हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा के दिन सिरौली का यह पावन स्थल श्रद्धालुओं से भर उठता है। दूर-दराज़ के गांवों से लोग पैदल, वाहन या बैलगाड़ी से यहां पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में हनुमान जी के दर्शन, पूजा-अर्चना और मन्नतें मांगने वालों की भीड़ उमड़ती है। स्थानीय श्रद्धालु परंपरा के अनुसार भंडारे का आयोजन करते हैं। मेला प्रांगण में झूले, खिलौनों की दुकानें, पूजा सामग्री, हस्तशिल्प, और खानपान के ठेले पूरे वातावरण को रंगीन बना देते हैं। बच्चों की हंसी और शंख-घंटियों की ध्वनि के बीच आस्था की यह महक सिरौली को एक जीवंत लोक उत्सव में बदल देती है।

प्रकृति की गोद में बसा यह तीर्थ
मंदिर से मात्र 50-60 मीटर दूरी पर हसदो नदी कलकल बहती है, जो स्थल को और अधिक पवित्र बनाती है। वहीं लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित उदलकछार जलप्रपात अपनी श्वेतधारा से पर्यटकों को मोह लेता है। श्रद्धा के साथ-साथ प्रकृति की यह सुषमा सिरौली को आध्यात्मिक और पर्यटन – दोनों दृष्टियों से विशिष्ट बनाती है।

लोक परंपरा की जीवंत धरोहर
सिरौली मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह हमारी लोक संस्कृति, सामाजिक एकता और ऐतिहासिक चेतना का प्रतीक है। एक सदी से अधिक समय से यह मेला निरंतर लोगों को जोड़ता आया है – पीढ़ी दर पीढ़ी भक्ति और परंपरा की यह ज्योति आज भी समान तेज से प्रज्वलित है। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर सिरौली की यह पवित्र भूमि आज भी यही संदेश देती है। “जहां आस्था है, वहीं संस्कृति जीवित है।”

Yogesh Bansal

Editor in Chief

Yogesh Bansal

Editor in Chief

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button